प्रस्तावनाखंड : विभाग तिसरा. बुद्धपूर्वजग
प्रकरण ५ वें.
वेदकालांतील शब्दसृष्टि.
अजीव सृष्टि.
पृथ्वी.
पृथ्वी नामें [ॠग्वेद ]
अदिति | गातु | भूम |
अवनि | गो | भूमि |
इळा | गोत्रा | मधुवृध |
उरुक्षिति | ग्मन् | मही |
उर्वी | जगत् | रिप् |
ककुत् | ज्म | रुप् |
कूचक्र | ज्मा | रेणु |
क्षमा | दिती | रेक्णस्वती |
क्षा | द्विबर्हज्मा | ३ लोक |
क्षामन् | निर्ॠति | वधर्यन्ती |
क्षामा | पद्या | वि |
क्षिति | पवस्ता | शतर्चस् |
क्षोणी | पूषन् | समना |
क्ष्मा | पृथिवी | सूपायना |
गव्यूति | १पृथ्वी | हरिधायस् |
भू | ह्लादिकावती | |
[अथर्व वेद] | ||
अग्रइत्वरी | ज्मी | वसुधानी |
अज्मन् | परिज्मन् | विजमाना |
अनृक्षरा | पुरुची | विधरणी |
असितज्ञू | पृथिवी | विधु |
इडा | प्रतिशीवरी | विश्वगर्भा |
इन्द्रॠषभा | भू | विश्वभरा |
उर्वरा | भूरिधायस् | विभृग्वरी |
उर्वी | भूरिधारा | वैश्वानरंबिभ्रती |
क्षमा | महिव्रत | वैष्टप |
क्षिति | मातरिश्वरी | सुभ् |
क्षोणी | मेदिनी | सृष्टि |
घृतस्नू | रसा | हविर्धाम |
जगत् | रोदसी | हिरण्यवक्षा |
जगतोनिवेशन | वरणवती | ह्लादिका |
१पृथिवी :- रुंद पसरलेली भूमि अशा अर्थानें ॠग्वेद व तदनंतरच्या ग्रंथांत हा शब्द आला आहे. पुष्कळ वेळां ही देवता मानण्यांत येते. कित्येक वेळां ही एकटीच देवता मानली जाते व कित्येक वेळां द्यावापृथिवी अशी संयुक्त मानली जाते. नेहमीं तीन लोकांचा उल्लेख येतो परंतु आपण राहतों ती पृथ्वी सर्वांत श्रेष्ठ होय असें वर्णन येतें. पृथ्वीच्या सभोंवार समुद्राचा कंबरपट्टा आहे असें ऐतरेय ब्राह्मणांत (८.२०) म्हटलें आहे. निरुक्ताप्रमाणें (९.३१) विश्व अनेक जगतांचे बनलेलें आहे व प्रत्येक जगांत एक एक पृथिवी आहे. शतपथ ब्राह्मणांत पृथ्वीला प्रथमसृष्टि असें म्हटलें आहे, व तिच्या संपत्तीचा उल्लेख केला आहे. शांखायन आरण्यकांत पृथिवीला 'वसुमती=संपत्तीनें परिपूर्ण' असें म्हटलें आहे.
२भू अथवा भूमि :- हा जमीन या अर्थानें नेहमी येणारा शब्द आहे. ॠग्वेद व तदनंतरच्या ग्रंथांत हा वारंवार येतो व तो पृथ्वी या अर्थानें असतो. देवानें आर्यांस दिलेल्या जमीनीबद्ल व देणगीदाखल दिलेल्या जमीनीबद्ल हा शब्द उपयोगांत आणला आहे.
३लोक :-ॠग्वेदांत व पुढील ग्रंथांत याचा अर्थ जग असा आहे. अथर्ववेद व ब्राह्मणग्रंथ यांत तीन लोकांचा उल्लेख आला आहे. अयं लोक: (हें जग), आणि याच्या उलट असौ लोक: (पलीकडीलजग=स्वर्ग) असे शब्द पुष्कळ वेळां आलेले आहेत. लोक हा शब्द कधी कधीं स्वर्ग या अर्थी आलेला आहे. कित्येक ठिकाणीं अनेक त-हेचे स्वर्ग वर्णिले आहेत. रॉथच्या मताप्रमाणें ॠ. १०.१४,९ या स्थली तरी लोक याचा जागा असा अर्थ असावा. त्याला पोषक अशीं स्थळें पुढील १०.९३,६;२.३०,६;३.२,९ आहेत.